बड़ाकवि अटल

वो सियासी पूस की रातों का सूरज ढल गया ।। इक बड़ाकवि अटल नामक इस जगत से टल गया ।। राजनीतिक पंक में खिलता रहा जो खिलखिला , हाय ! वो सुंदर मनोहर स्वच्छ भोर कमल गया ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

चित्र काव्य : वो

बहुत ही ख़ास बहुत ही अज़ीज़ था मेरा , वो आस्माॅं में कहीं हाय खो गया इक दिन ।। चुरा के मुझसे मेरा दिल क़रार की नींदें , बग़ैर मुझको बताए ही सो गया इक दिन ।। न जाने क्यों...Read more

जूता – चित्र काव्य : 2

बर्फ़ की तह पर हिरन सा दौड़कर भी कब गला ? धूप में अंगार सी कब रेत पर मैं थम जला ? मेरी मंज़िल के तो सब ही रास्ते पुरख़ार थे , उनपे हँसते -हँसते मैं जूतों के ही दम पर चला !...Read more

■ जूता – चित्रकाव्य

पण्डितों से , ठाकुरों , बनियों , अछूतों से ; चाहे मत करना फ़रिश्तों , प्रेतों , भूतों से ; हाँ मगर जितनी करो तुम टोप से अपने , उतनी ही करना मोहब्बत अपने जूतों से ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

इक जनवरी को मैं

न काटे से कटूँ ; चीरे चिरूँ , इक जनवरी को मैं !! न ही घेरे किसी ग़म के घिरूँ , इक जनवरी को मैं !! न पूछो क्या है मुझसे राज़ लेकिन झूठ ना बोलूँ , किसी भी साल की नचता फिरूँ , इक जनवरी को मैं !!...Read more