जूता – चित्र काव्य : 2

बर्फ़ की तह पर हिरन सा दौड़कर भी कब गला ? धूप में अंगार सी कब रेत पर मैं थम जला ? मेरी मंज़िल के तो सब ही रास्ते पुरख़ार थे , उनपे हँसते -हँसते मैं जूतों के ही दम पर चला !...Read more

■ जूता – चित्रकाव्य

पण्डितों से , ठाकुरों , बनियों , अछूतों से ; चाहे मत करना फ़रिश्तों , प्रेतों , भूतों से ; हाँ मगर जितनी करो तुम टोप से अपने , उतनी ही करना मोहब्बत अपने जूतों से ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

इक जनवरी को मैं

न काटे से कटूँ ; चीरे चिरूँ , इक जनवरी को मैं !! न ही घेरे किसी ग़म के घिरूँ , इक जनवरी को मैं !! न पूछो क्या है मुझसे राज़ लेकिन झूठ ना बोलूँ , किसी भी साल की नचता फिरूँ , इक जनवरी को मैं !!...Read more

मत हँसें !

[ चित्र Google Search से साभार ]  चाहकर भी हो न पाते छरहरे , हम पे क़ुदरत का है ये ज़ुल्मो-सितम ॥ हम पे हँसने की जगह करना दुआ , कैसे भी हो ? हो हमारा वज़्न कम ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

विश्वासघात

विश्वासघात को लेकर सबके अपने-अपने व्यक्तिगत अनुभव हैं किन्तु एक बात सर्वव्यापी है  कि इसका आघात सबके लिए अकस्मात , अनपेक्षित और असहनीय होता है , फिर चाहे वह बड़ा हो या छोटा धोखा । और तब तो यह और भी पीड़ादायी हो जाता है जबकि...Read more