अकविता (10) – वक्तृता अथवा अंग्रेजी भाषा ?

क्या अंग्रेजों के ऊपर भी एक अंग्रेजी की वक्तृता मुझ जैसे अंग्रेजी न जानने वाले हिन्दुस्तानी की तरह ही कुछ भी न समझ आने के बावजूद भी वशीभूत कर डालने वाला प्रभाव डालती है ? इसी प्रकार की अन्य किसी भाषा...Read more

अकविता (9)- यहाँ कोई विज्ञापन न लगाएँ

दीवारों पे जगह-जगह चस्पा इस बात का विज्ञापन कि यहाँ कोई विज्ञापन न लगाएँ इस बात का स्पष्ट विज्ञापन लगता है कि यहाँ विज्ञापन करना अवश्यमेव लाभदायक है अतः हमें मुँहमाँगा किराया देने की पेशकश करें , हमें मनाएँ और यहाँ...Read more

अकविता (8) – कितना अच्छा था वह ?

उसके मरने के बाद – कितना क़ीमती था वह ? कितना उपयोगी था वह ? कितना अच्छा था वह ? और भी न जाने क्या-क्या वह था ? जो उसे मैंने कभी नहीं समझा , कभी नहीं कहा – पता चला । -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

अकविता : ( 7 ) – प्रशंसा

यद्यपि यह काम मुझे अत्यंत चापलूसी पूर्ण लगता है किन्तु जब कभी भी मैं दृढ़ निश्चय करके कुछ बोल ही देना ठान लेता हूँ कि शब्दों के होंठ छोड़ने से ठीक पहले बाँस हो जाती है उसकी दूब , दुग्धता हो...Read more

अकविता [ 6 ] : आईने…….

उनके कहे से , हमारी काक ध्वनि कोयल कुहुक हो जाएगी क्या ? हमारी पिचकी-चपटी नाक नुकीली हो जाएगी क्या ? उनके बारंबार कहते रहने से हमारा पजामा जींस नहीं हो जाएगा । कोई भूलकर भी जब वह नहीं कहता जो-जो हम सुनना...Read more

अकविता [ 5 ] : अच्छा कवि…………

मेरे आत्मीय फ़ेसबुक पाठकों , क्यों आप कहते रहते हो कि लिखता हूँ ‘मैं’  ‘उससे’ अच्छा ‘जो’ मुझसे कई सालों बाद जन्मा और कविताई में उतरा ? किन्तु फिर क्यों ‘उसे’ अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों में आमंत्रित किया जाता है ? ‘मुझे’ गाँव की घरेलू काव्य-गोष्ठियों से भी...Read more