गीत : 44 – जी भर गया है ॥

कि चाहो तो क्या तुम न चाहो तो क्या है ? मोहब्बत से अब अपना जी भर गया है ॥ न धोखाधड़ी की न जुल्म-ओ-जफ़ा की । जो करता हो बातें हमेशा वफ़ा की । मगर तज़्रिबा अपना ज़ाती ये कहता , वही...Read more

गीत : 43 – भारी बारिश में धू-धू जल बैठीं ॥

सूखे पत्तों में जैसे झट से आग लग जाए । पतला कागज़ तनिक सी देख लौ सुलग जाए । मेरी जितनी भी कामनाएँ थीं , भारी बारिश में धू-धू जल बैठीं ॥ जैसे पानी में होता हाल कच्ची मिट्टी का...Read more

गीत : 42 – क्या किसी भूले हुए

क्या किसी भूले हुए ग़म की याद आने लगी ? हँसते – हँसते हुए क्यूँ आँख छलछलाने लगी ? क्या किसी भूले हुए…………………….. आँख कस – कस के भी लगाए लग न पाती है । रात करवट बदल – बदल के बीत...Read more

गीत : 41 – मैं क्यों कवि बन बैठा ?

कई प्रश्न स्वयं के अनुत्तरित – इक यह कि मैं क्यों कवि बन बैठा ? बाहर चहुँँदिस वह चकाचौंध । आकाश-तड़ित सी महाकौंध । प्रत्येक उजालों का रागी , जुगनूँ तक पे सब रहे औंध । यद्यपि मैं पुजारी था तम का ,...Read more

गीत : 40 – अलाव नहीं है ॥

चाहे धरा पे चाहे चाँद पे या अधर पर ॥ जो चाहते हैं वह न लाके दोगे तुम अगर ॥ तुम लाख कहो तुमको हमसे प्यार है मगर , हम समझेंगे हमसे तुम्हें लगाव नहीं है ॥ सिंगारहीन हमको देखकर अगर...Read more

गीत : 39 – चिथड़े-चिथड़े, टुकड़े-टुकड़े

पूर्णतः था जिसपे मैं दिन – रात निर्भर ॥ आज अचानक दिल के दौरे से गया मर ॥ उसको मैं क्योंकर न धोख़ेबाज़ बोलूँ ? माँगता था उससे मैं जब कुछ कि यह दो । जितना जी चाहे वो कहता था...Read more