[] नज़्म : 07 – बेरोज़गारी

दर्द क्या बेरोज़गारों का वो समझेगा अरे – जो विरासत के ख़ज़ाने पर मगन लेटा रहे ; और वो भी जिसको रोज़ी मिल गई आराम से ; तेरी बेकारी का किस्सा सुनके क्यों रोवे भला ? ठीक है हलकी सी...Read more

[] नज़्म : 06 – बिस्मिल

इंसान को बदलना , मुश्किल से भी है मुश्किल ।। इक बाज़ से मुझे तुम , तो कर रही हो हारिल ।। आकर तुम्हारी बातों , में मैं बदल रहा हूँ , हाथी हूँ बंदरों सा , लेकिन उछल रहा...Read more

[] नज़्म : 05 – डायरी

इक इशारे पे मैं उसके क्या हुआ लँगड़ा व लूला , उसने मेरे प्यार को फिर ज़िन्दगी भर ना क़बूला ? सोच में हफ़्तों-महीनों क्या मैं सालों साल से था , अपनी उस रूदादे ग़म को जो मरी होते ही...Read more

[] नज़्म : 04 – क़सम

फ़क़त इक दिन में गिन-गिनकर , कम अज़ कम दस दफ़्आ योंही , मेरे आगे न अपने हुस्न का जल्वा करो आकर !! मुझे मालूम है गर्मी का मौसम आग बरसाता , है जब नल घर में तो पनघट पे...Read more

[] नज़्म : 3 – फ़र्ज़

नहीं चाहता जिनकी सूरत भी देखूँ , उन्हीं के है दीदार का हुक़्म मुझको !! जिन्हें चाहता हूँ कि बस मार डालूँ ; मगर उनसे ही प्यार का हुक़्म मुझको !! तुम्हें क्या पता क्यों मैं जाता उधर हूँ ?...Read more

[] नज़्म : 2 – काला बंदर

मैं इक फूल की नर्म सी पंखुड़ी था , वो बिच्छू के डंकों सा बेरी का काँटा ।। चपत था मैं इक प्यार की गाल पर वो , बहुत ज़ोर का एक मुक्के सा चाँटा ।। मैं सचमुच शहद या...Read more