[] नज़्म : 3 – फ़र्ज़

नहीं चाहता जिनकी सूरत भी देखूँ , उन्हीं के है दीदार का हुक़्म मुझको !! जिन्हें चाहता हूँ कि बस मार डालूँ ; मगर उनसे ही प्यार का हुक़्म मुझको !! तुम्हें क्या पता क्यों मैं जाता उधर हूँ ?...Read more

[] नज़्म : 2 – काला बंदर

मैं इक फूल की नर्म सी पंखुड़ी था , वो बिच्छू के डंकों सा बेरी का काँटा ।। चपत था मैं इक प्यार की गाल पर वो , बहुत ज़ोर का एक मुक्के सा चाँटा ।। मैं सचमुच शहद या...Read more

[] नज़्म []

जाने किस हाल में है , है वो ख़ुश कि है ग़मगीं ? जाओ ढूँढो उसे , छुपा नहीं वो खोया है ; सच न देखूँगा और कुछ भी मैं ज़माने में , अब तो आँखों से उसका ही नज़ारा...Read more