■ मुक्तक : 1014 – वादा

तेरी हर ख़्वाहिश तेरी फ़र्माइशों के वास्ते , बन पड़ेगा जिस तरह भी पर कमाकर जाउँगा ।। उम्र भर भी बैठकर तू खा सकेगा इस क़दर , तेरे ख़र्चों के लिए दौलत जमाकर जाउँगा ।। जाने क्यों लगता है मुझको...Read more

■ मुक्तक : 1013 – पागल

गर समझ जाओगे तुम मेरी हँसी का क्या सबब ? कह उठोगे चौंककर बेसाख़्ता पागल अजब ।। तो भला ख़ुद क्यों बताऊँ क्यों लगाऊँ क़हक़हा – मैं वहाँ जिस जा पे जा रोवे हैं बुक्का फाड़ सब ? -डॉ. हीरालाल...Read more

■ चित्र मुक्तक : चरवाहा

भेड़ों न बकरियों से मुझको कुछ दुलार है ।। गायों से भी न रंचमात्र प्यार-व्यार है ।। इनको चरा रहा हूँ अपना पेट पालने , मत चौंकिए ये मेरा सिर्फ़ रोज़गार है ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

■ मुक्तक : 1012 – दम

जिनके क़द हों बौने जिनमें पत्ते तक बचे हों कम ; रखते हैं दरख़्त वे भी साये बाँटने का दम ।। और मालदारों से जो मुफ़्त कुछ मँगाइए , तब ही ये कहेंगे ” हाथ तंग है गदा हैं हम...Read more

■ मुक्तक : 1011 – चढ़ाई

कुछ उधेड़ने को लम्हा-लम्हा है अजीब पर , मुझसे पूरे होशमंद रह बुनाई की गई ।। प्यार के लिए फ़क़त हाँ सिर्फ़ प्यार के लिए , मुझसे हर जगह पे बेतरह लड़ाई की गई ।। झोपड़ों से मैं डरा रहा...Read more

■ मुक्तक : 1010 – अपलक

देखो कि देखता हूँ मैं तुमको किस तरह से ? क्यों तुम न मुझको देखा करते हो इस तरह से ? सुधबुध को भूल अपनी अपलक निहारता है , कोई चकोर चंदा को ठीक जिस तरह से ।। -डॉ. हीरालाल...Read more