मुक्तक : 1043 – पलटा

जाने क्या हासिल हुआ या खो गया या छिन गया , तर्ज़ो अंदाज़ आजकल सब खा गया पलटा मेरा ? पाॅंवों से करता हूॅं अपने सब के सब ही काम मैं , कारवाॅं दिन-रात अनथक हाथों से चलता मेरा ।।...Read more

मुक्तक : 1041 – पत्थर

पत्थर हूॅं पड़ा सोचूॅं कि मैं चल जाऊॅं ।। पानी हूॅं मगर चाहूॅं कि मैं जल जाऊॅं ।। दलदल से निकल जाने की मेरी कोशिश , हाथी की तमन्ना जैसे उछल जाऊॅं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 1040 – नक़ाब

डर , उनके हुक़्म से उन्हीं के रोब ओ दाब से ।। चेहरा छुपा दिखा दिया हमने नक़ाब से ।। अफ़्सोस है कि जिनकी हम नज़रों में कल तलक , थे आफ़्ताब हो गए अब माहताब से ।। -डॉ. हीरालाल...Read more

मुक्तक : 1039 – तब और अब

पहले बिस्तर देखते ही नींद आ जाती थी अब , नींद की गोली के बिन सोना नहीं आता हमें ।। जागते भी कितने सपने कल तलक देखे और अब , नींद में भी ख़्वाब में खोना नहीं आता हमें ।।...Read more

मुक्तक : 1038 – पागल

हुआ इक अजब हादिसा , ताज़ा-ताज़ा , कहीं कोई मुर्दा गड़ा ही गड़ा था ।। वाॅं सब मुॅंह को बैठे थे तालों सा लटका , मैं गर्दन उठा ऊॅंट जैसा खड़ा था ।। मुझे इस क़दर तब थी हॅंसने की...Read more

मुक्तक : 1037 – तेरा ग़म

आरी से जैसे कोई लकड़ी को काटता है , पत्थर पे जैसे कोई चटनी को बाटता है , जैसे कि खाए गेहूॅं को घुन कुतर-कुतर कर , ग़म तेरा मुझको वैसे दीमक सा चाटता है ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more