मुक्तक : 1053 – सोच

उसके बग़ैर ज़िंदगी के पाॅंव कट गए , ख़्वाबों के पर उड़ान से ही पेशतर जले ।। साॅंसें चले हैं या कि तेज़ ऑंधियाॅं चलें , चलता हूॅं तो लगे चिता से लाश उठ चले ।। पल काटना है जब...Read more

मुक्तक : 1052 – सुअर

दुखती हैं एड़ियाॅं औ’ तिस पे मोच पाॅंव में , चलता हूॅं जोंक-केंचुओं सा साल भर से सच ।। देखूॅं मैं चौंक -चौंक टकटकी लगा पड़ा , लॅंगड़े भी बढ़ रहे उधर उचक इधर से सच ।। दुनिया में सब...Read more

स्वप्न

मैंने कुछ शेर शौक़ से अपने , घर के ऑंगन में पाल रक्खे हैं , जिनको ले जाके मैं चरोखर में , घास पत्ती हरी चराता हूॅं ।। अपनी गायों को तुपनी भैंसों को , चंट बकरी को लंठ भेड़ों...Read more

मुक्तक : 1052 – ढब

दरख़्तों के साए में दुनिया से छुपकर मैं कब से खड़ा हूॅं ? निगाहें झुका सिर झुका बंदगी से अदब से खड़ा हूॅं ।। वो दे देंगे आकर ख़ताओं पे मेरी मुआफ़ी मुझे बस , यही सोचकर इस क़रीने से...Read more

मुक्तक : 1051 – बता

बर्फ पर कभी-कभी , कभी धधकती आग में , पैनी-पैनी कीलों पर , कभी नुकीली सॉंग पर ।। कब खड़ा रहा न तेरे काम के लिए भला , सुब्हो शाम रात-दिन मैं सिर्फ़ एक टाॅंग पर ? कैसे कह गया...Read more

मुक्तक : 1050 – हार

मैं नहीं होता भयाकुल , पुण्य से ना पाप से ।। मैं नहीं रोता अयाचित , हर्ष या संताप से ।। मैं समय भी जीत लूॅं , मैं मृत्यु को भी मार दूॅं , किंतु मैं हारूॅं सदा अपनों से...Read more