■ मुक्तक : 1010 – अपलक

देखो कि देखता हूँ मैं तुमको किस तरह से ? क्यों तुम न मुझको देखा करते हो इस तरह से ? सुधबुध को भूल अपनी अपलक निहारता है , कोई चकोर चंदा को ठीक जिस तरह से ।। -डॉ. हीरालाल...Read more

■ मुक्तक : 1009 – उलटा

सुलगकर मैं होता चलूँ और भी नम ।। मनाऊँ लगा क़हक़हा सारे मातम ।। मैं उलटा हूँ वो पीके लूँ ज़िंदगानी , जिसे चखते ही तोड़ देते हैं सब दम ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

■ 1008 – दुआएँ

कभी झुकने नहीं देतीं , उठाए मुझको रखती हैं ।। तुनुक मिटने नहीं देतीं , बनाए मुझको रखती हैं ।। वहाँ है मौत डग-डग पर , मैं जिन राहों पे चलता हूँ , दुआएँ हैं किसी की जो , बचाए...Read more

■ मुक्तक : 1007 – ज़िद

                     ( चित्र Google Search से साभार ) उसके सफेद बैलों , के नाम कृष्ण और श्याम ।। कोयल का नाम बिजली , तोते का नाम संतराम ।। सुन-सुनके मुझसे आँगन...Read more

■ मुक्तक : 1006 – नवी

लोग दक़्यानूसी कहते , थे सभी जिसको , मेरी , अज़ सरापा आँख को , बिलकुल नवी लगती रही !! जाने थी किस गाँव की मैं , पूछ भी पाया नहीं , हाँ ! अदाओं से बड़े से , शह्र...Read more

■ मुक्तक : 1005 – जला डाला

इक हिमालय को सबने मिलके अपनी ताक़त से , जा से सरकाने ज़ोर-ज़ोर से हला डाला ।। सख़्त पत्थर सा बर्फ़ आफ़्ताब से मिलकर , देखते-देखते ही मोम सा गला डाला ।। सबही आए थे सोचकर गुनाह करने को ;...Read more