मुक्तक : 1026 – प्यार

तन-मन में कूट-कूट प्यार भर के आए हैं ।। उड़-उड़ क़रीब सच बग़ैर पर के आए हैं ।। जब-जब किया तलब पलक झपक वो मुझ तलक , दुलहन की तरह ख़ूब सज-सॅंवर के आए हैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 1025 – घूरना

नज़र का मेरी उसकी नज़रों से जाकर , हुआ एक लम्हा ही धोखे से लड़ना ।। ठिठक कर उसे देखकर एक दम में , हुआ पूरे इक सौ दफ़्आ चौंक पड़ना ।। उधर उसका मुझको बड़े ग़ैज़ में भर ,...Read more

मुक्तक : 1024 – हॅॅंसी

लबों के पुल से गोली सी , गुजरने के लिए आती ।। नहीं इन पर हॅंसी पल भर , ठहरने के लिए आती ? मेरी दुश्मन नहीं फिर भी , ये बदली क्यों बरसने का , मेरे सूखे से वादा...Read more

मुक्तक : 1023 – रद्दोबदल

सतपुड़ा के पहाड़ों सा कब से खड़ा , वक़्त सा अब थके बिन चला जा रहा ।। मरघटी चुप्पियों से उलट कृष्ण की , बाॅंसुरी सी मधुर धुन बना जा रहा ।। देख रद्दोबदल मुझमें ऐसा सभी , सख़्त हैराॅं...Read more

मुक्तक : 1022 – मंच

अब नसीहत के लिए लिखने में है ख़तरा बहुत , अब जरीआ ये नहीं हरगिज़ रही तम्बीह का ।। जिसको पढ़-सुन बस हॅंसी ही आए वो ही वो लिखो , रंच भर भी उसमें पुट चाहे रहे न सहीह का...Read more

मुक्तक : 1021 – अज़्म

मैं उधड़ता और फटता ही रहूॅं लेकिन ये है , ख़ुद को ख़ुद ही जिस तरह भी बन पड़े सीता चलूॅं ।। प्यास को अपनी मयस्सर ना रहे पानी अगर , अपने ऑंसू ही पसीने में मिला पीता चलूॅं ।।...Read more