■ मुक्तक : 1005 – जला डाला

इक हिमालय को सबने मिलके अपनी ताक़त से , जा से सरकाने ज़ोर-ज़ोर से हला डाला ।। सख़्त पत्थर सा बर्फ़ आफ़्ताब से मिलकर , देखते-देखते ही मोम सा गला डाला ।। सबही आए थे सोचकर गुनाह करने को ;...Read more

■ मुक्तक : 1004 – नाग

राम रटता मत हरा तोता सही , काँव करता एक काला काग रख ।। एक चितकबरी सी बिल्ली गोद ले , या भले कुत्ता कोई बेदाग़ रख ।। गाय यदि ना मिल सके तो इक सुअर ; पाल ले कैसा...Read more

■ मुक्तक : 1003 – बदल रहा हूँ मैं

नहीं कोई चिराग़ वर्ना आँधियों में क्यों , भले ही फड़फड़ा के फिर भी जल रहा हूँ मैं ? कटे नहीं है मेरे पैर तब तो काँटों पे , पहन के जूते ख़ूब तेज़ चल रहा हूँ मैं ।। मैं...Read more

■ मुक्तक : 1002 – तमन्ना

मुझको उसने न सिर्फ़ आँखों में जगह दी थी , बल्कि दिल में भी चंद रोज़ को बसाया था ।। उसको बेशक़ कभी न मेरी थी तमन्ना पर , मैंने बढ़चढ़ उसी के ख़्वाबों को सजाया था ।। हो रहा...Read more

■ मुक्तक : 1001 – कुंदा ए आबनूस

वो जो तस्वीर में मुझे लगे थे फूलों से , उनको जाना तो पाया उनसे अच्छे पत्थर हैं ।। मात देते हैं तितलियों को शक्लोसूरत से , हाय तासीर में जो ख़ूँ के प्यासे मच्छर हैं ।। जब तलक अजनबी...Read more

■ मुक्तक : 1000 – ख़्वाब

सर पे गारा-ईंट-पत्थर-ख़ाक ढोते ।। सिर्फ़ जो दो जून की रोटी को रोते ।। देख कर पर्वाज़ भरते पंछियों को , क्यों वे उड़़ना चाहें जिनके पर न होते ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more