मुक्तक : 16 -मेरे भी अँधेरों को

मेरे भी अँधेरों को इक आफ़्ताब देना ।। इक ,ज़िंदगी बदल दे ,ऐसी किताब देना ।। हरगिज़ तलब न शरबत-ओ-शराब की है मुझको , मेरी तिश्नगी की ख़ातिर मक्के का आब देना ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 15 – तमगे तो हमें

तमगे तो हमे एक नहीं चार मिले हैं ।। इक बार नहीं चार चार बार मिले हैं ।। चुन चुन के ऊँची-ऊँची डिग्रियों के वास्ते , अब तक मगर न कोई रोज़गार मिले हैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 14 – यों मुँह पे करता

यों मुँह पे करता मीठी , हर बात वो आकर ।। पर पीठ पीछे करता , उत्पात वो आकर ।। मिल बैठ कैसे होगा , इस मसले का हल तब , करता है घात पर जब , प्रतिघात वो आकर ? -डॉ....Read more

मुक्तक : 13 – वस्त्रविहीनों से पूछो

वस्त्र-विहीनों से पूछो सर्दी में स्वेटर का मतलब ।। फ़ुटपाथों पर रहने वालों से पूछो घर का मतलब ।। जिनको इक भी जून मयस्सर भात नहीं दो कौर रहे , उनसे पूछो घूरे की मुट्ठी भर जूठन का मतलब ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 12 – आँख सैलाब इक

आँख सैलाब इक भरा सा है ।। यों वो गुर्राये पर डरा सा है ।। सिर्फ़ लगता है मस्त और ज़िंदा , सचमुच अंदर मरा मरा सा है ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 11 – फ़र्ज़

फ़र्ज़ , क़ायदा-ओ-क़ानून निभाने में उस्ताद हूँ मैं ।। बस उसूलों की ज़ंजीरों से , जकड़ा इक आज़ाद हूँ मैं ।। ख़ूब आज़माइश झुलसाकर , ठोंका-पीटी कर करलो , मोम नाँह हूँ आला दर्ज़े , का लोहा-फ़ौलाद हूँ मैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more