■ मुक्तक : 7 – औरतों सा सख़्त ग़म में

औरतों सा सख़्त ग़म में भी सुबुकने ना दिया ।। सर किसी क़ीमत पे मैंने अपना झुकने ना दिया ।। मुझको लँगड़ा कहने वालों के किये यूँँ बंद मुँँह , मैंने मंज़िल पर भी आकर ख़ुद को रुकने ना दिया ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

■ मुक्तक : 6 – कि जैसे आपको नीर

कि जैसे आपको नीर अपने घर का क्षीर लगता है ।। ज़रा सा पिन किसी सुल्तान की शम्शीर लगता है ।। तो फिर मैं क्या ग़लत कहता हूँ मुझको शह्र गर अपना , भयंकर गर्मियों में वादी-ए-कश्मीर लगता है ? –डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

■ मुक्तक : 5 – अब यास से

अब यास से है अपने , लबरेज़ दिल का आलम ।। उम्मीद की बिना पर , अब तक रहे थे कायम ।। जब हर तरफ़ मनाही , है चप्पा-चप्पा नफ़्रत , बतलाओ किस बिना पे , ज़िंदा रहें भला हम ?...Read more

■ मुक्तक : 4 – दुनिया का अनोखा ही

दुनिया का अनोखा ही कारबार हो रहा ।। अब भीख मँगाना भी रोज़गार हो रहा ।। इतना है मुनाफ़े का काम ये कि शौक़ से , इसमें पढ़े-लिखों का तक शुमार हो रहा ।।  -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

■ मुक्तक : 3 – न आँखें नम

न आँखें नम न चेहरा ही कभी करता उदास ।। न बोले है किसी से अपना दर्दे दिल न यास ।।   वो ख़ामोशी से गुट-गुट ख़ूब पीता है शराब , तअज्जुब ये न हों ग़ायब कभी होशोहवास !! -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

■ मुक्तक : 2 – जिसका रब चाहे

जिसका रब चाहे अगर , धड़ का बना देना सर ।। वो अतल से भी उबर , आता है चलकर ऊपर ।। गर न मर्ज़ी हो ख़ुदा , की तो परों के होते , तैर मछली न सके , उड़ न सके खग फर-फर ।। -डॉ....Read more