मुक्तक : 4 – दुनिया का अनोखा ही

दुनिया का अनोखा कारोबार हो रहा ।। भीख माँँगना भी रोज़गार हो रहा ।। इस क़दर मुनाफ़े का ये पेशा है कि अब , याँ पढ़े-लिखों का भी शुमार हो रहा ।।  -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 3 – न आँखें नम

न आँखें नम न चेहरा ही कभी करता उदास ।। न बोले है किसी से अपना दर्दे दिल न यास ।।   वो ख़ामोशी से गुट-गुट ख़ूब पीता है शराब ,   तअज्जुब ये न हों ग़ायब कभी होशोहवास !! -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 2 – जिसका रब चाहे

जिसका रब चाहे अगर , धड़ का बना देना सर ।। वो अतल से भी उबर , आता है चलकर ऊपर ।। गर न मर्ज़ी हो ख़ुदा , की तो परों के होते , तैर मछली न सके , उड़ न सके खग फर-फर ।। -डॉ....Read more

मुक्तक : 1 – हँस हँस के करे माफ़

हँस-हँस के करे माफ न रो-रो के सज़ा दे ॥ अब हिज़्र का ग़म मुझको तो मिलने का मज़ा दे ॥  कल चाह थी मिल जाती रे जीने से रिहाई , अब चाहूँ कि रब मुझको कभी भी न क़ज़ा दे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 801 – नश्वर

कौन यह जानता नहीं कि काया नश्वर है ? सबका जीवन यहाँ पे जल का बुलबुला भर है ॥ स्वप्न फिर भी वो जन्म-जन्म के सँजोता यों , जैसे अमृत की आया मटकियाँ गुटक कर है ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more