■ मुक्तक : 9 – चूहे सब शेर

चूहे सब शेर -ए- बब्बर की बात करते हैं ।। जितने हारे वो सिकंदर की बात करते हैं ।। रब ने दे क्या दी ज़ुबाँ कान पास तो लाओ , अंधे रंगीनी -ए- मंज़र की बात करते हैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

■ मुक्तक : 8 – सर्दियों में ज्यों सुलगती

सर्दियों में ज्यों सुलगती लकड़ियाँ अच्छी लगें ॥ जैसे हँसती खिलखिलाती लड़कियाँ अच्छी लगें ॥ मुझको मौसम कोई हो जलता-जमाता-भीगता , बंद कमरे की खुली सब खिड़कियाँ अच्छी लगें ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

■ मुक्तक : 7 – औरतों सा सख़्त ग़म में

औरतों सा सख़्त ग़म में भी सुबुकने ना दिया ।। सर किसी क़ीमत पे मैंने अपना झुकने ना दिया ।। मुझको लँगड़ा कहने वालों के किये यूँँ बंद मुँँह , मैंने मंज़िल पर भी आकर ख़ुद को रुकने ना दिया ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

■ मुक्तक : 6 – कि जैसे आपको नीर

कि जैसे आपको नीर अपने घर का क्षीर लगता है ।। ज़रा सा पिन किसी सुल्तान की शम्शीर लगता है ।। तो फिर मैं क्या ग़लत कहता हूँ मुझको शह्र गर अपना , भयंकर गर्मियों में वादी-ए-कश्मीर लगता है ? –डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

■ मुक्तक : 5 – अब यास से

अब यास से है अपने , लबरेज़ दिल का आलम ।। उम्मीद की बिना पर , अब तक रहे थे कायम ।। जब हर तरफ़ मनाही , है चप्पा-चप्पा नफ़्रत , बतलाओ किस बिना पे , ज़िंदा रहें भला हम ?...Read more

■ मुक्तक : 4 – दुनिया का अनोखा ही

दुनिया का अनोखा ही कारबार हो रहा ।। अब भीख मँगाना भी रोज़गार हो रहा ।। इतना है मुनाफ़े का काम ये कि शौक़ से , इसमें पढ़े-लिखों का तक शुमार हो रहा ।।  -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more