मुक्तक : 1017 – काइनात

मेरी मुश्किल की बिलआख़िर नजात वो ही हैं ।। हाॅं वो ही मेरा जनाज़ा ; बरात वो ही हैं ।। दोस्त मेरे हैं बहुत कम , मगर हैं जितने भी , मुझको लगता है मेरी काइनात वो ही हैं ।।...Read more

‌मुक्तक : 1016 – इरादा‌

इस ज़मीं पर नहीं और न उस , आस्माँ पर बनाऊँगा मैं ।। सुन मुनादी मेरी आज ये , और यक़ीं कर बनाऊँगा मैं ।। अपनी नज़रों में भी ना जगह देने वाले इरादा मेरा , एक दिन तेरे पत्थर...Read more

■ मुक्तक : 1015 – आईना

चढ़ता जोबन भी लुढ़कता सा जुरा लगने लगे ; ख़ुद को जब ख़ुद का हसीं-चेह्रा बुरा लगने लगे ; मत ज़रा होना मुशव्वश तब यही यह सोचकर ; फूल-आईना भला अब क्यों छुरा लगने लगे ? ( जोबन =जवानी /...Read more

■ मुक्तक : 1014 – वादा

तेरी हर ख़्वाहिश तेरी फ़र्माइशों के वास्ते , बन पड़ेगा जिस तरह भी पर कमाकर जाउँगा ।। उम्र भर भी बैठकर तू खा सकेगा इस क़दर , तेरे ख़र्चों के लिए दौलत जमाकर जाउँगा ।। जाने क्यों लगता है मुझको...Read more

■ मुक्तक : 1013 – पागल

गर समझ जाओगे तुम मेरी हँसी का क्या सबब ? कह उठोगे चौंककर बेसाख़्ता पागल अजब ।। तो भला ख़ुद क्यों बताऊँ क्यों लगाऊँ क़हक़हा – मैं वहाँ जिस जा पे जा रोवे हैं बुक्का फाड़ सब ? -डॉ. हीरालाल...Read more

■ चित्र मुक्तक : चरवाहा

भेड़ों न बकरियों से मुझको कुछ दुलार है ।। गायों से भी न रंचमात्र प्यार-व्यार है ।। इनको चरा रहा हूँ अपना पेट पालने , मत चौंकिए ये मेरा सिर्फ़ रोज़गार है ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more