मुक्तक : 1049 – सधी चाल

मैं लगता हूॅं यक़ीनन एक रोता खिलखिलाकर भी ।। लगूॅं डग-डग सधी ही चाल चलता लड़खड़ाकर भी ।। किसी के सख़्त ओ मज़्बूत शाने से खड़ा टिककर , नहीं गिरता मैं मैख़ाने से छककर पीके आकर भी ।। -डॉ. हीरालाल...Read more

मुक्तक : 1048 – छुप-छुप

तिरछी नज़र से उसको कब तक निहारता ? छुप-छुप दरार से भी कितना मैं ताकता ? मुझको कभी न जिसने ऑंखों में ऑंख धर- देखा तो मैं भी कब तक उसको ही चाहता ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 1047 – क़ुसूर

हर वक़्त ही जो दिल के पास है वो जिस्म से ,             धरती से चाॅंद जितना बल्कि और दूर है ।।               ऑंखों की मेरी सुर्ख़ियाॅं ख़राबियाॅं नहीं ,   ...Read more

मुक्तक : अश्क़बारी

हॅंसके जीने का अदाकार तो मैं हूॅं आला , पर मेरे दिल में ग़मों का गुबार पलता है ।। ख़ुद बख़ुद बज़्म में ज्यों क़हक़हे निकल जाऍं , वैसे ख़ल्वत में न टाले से रोना टलता है ।। सब ये...Read more

मुक्तक : 1045 – क्यों ?

ये मेरा दिल जो है पत्थर का खुश्क़ ऑंखों से , पिघल-पिघल के निकलता ही हाय ! जाए क्यों ? बिछुड़ते वक़्त भी रोया न था जो इक ऑंसू , वो आठ-आठ बड़े अश्क़ आज ढाए क्यों ? बहुत दिनों...Read more

मुक्तक : 1044 – बदला

बद्दुआ निकले है मेरे दिल से ये ही आजकल ; इश्क़ में लग जाए ऐसी आग वो बस जाए जल ।। कोयला उसने मुझे हीरे से करके रख दिया , मैं भी चाहूॅं वो भी ज़र से जाए मिट्टी में...Read more