■ मुक्तक : 1012 – दम

जिनके क़द हों बौने जिनमें पत्ते तक बचे हों कम ; रखते हैं दरख़्त वे भी साये बाँटने का दम ।। और मालदारों से जो मुफ़्त कुछ मँगाइए , तब ही ये कहेंगे ” हाथ तंग है गदा हैं हम...Read more

■ मुक्तक : 1011 – चढ़ाई

कुछ उधेड़ने को लम्हा-लम्हा है अजीब पर , मुझसे पूरे होशमंद रह बुनाई की गई ।। प्यार के लिए फ़क़त हाँ सिर्फ़ प्यार के लिए , मुझसे हर जगह पे बेतरह लड़ाई की गई ।। झोपड़ों से मैं डरा रहा...Read more

■ मुक्तक : 1010 – अपलक

देखो कि देखता हूँ मैं तुमको किस तरह से ? क्यों तुम न मुझको देखा करते हो इस तरह से ? सुधबुध को भूल अपनी अपलक निहारता है , कोई चकोर चंदा को ठीक जिस तरह से ।। -डॉ. हीरालाल...Read more

■ मुक्तक : 1009 – उलटा

सुलगकर मैं होता चलूँ और भी नम ।। मनाऊँ लगा क़हक़हा सारे मातम ।। मैं उलटा हूँ वो पीके लूँ ज़िंदगानी , जिसे चखते ही तोड़ देते हैं सब दम ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

■ 1008 – दुआएँ

कभी झुकने नहीं देतीं , उठाए मुझको रखती हैं ।। तुनुक मिटने नहीं देतीं , बनाए मुझको रखती हैं ।। वहाँ है मौत डग-डग पर , मैं जिन राहों पे चलता हूँ , दुआएँ हैं किसी की जो , बचाए...Read more

■ मुक्तक : 1007 – ज़िद

                     ( चित्र Google Search से साभार ) उसके सफेद बैलों , के नाम कृष्ण और श्याम ।। कोयल का नाम बिजली , तोते का नाम संतराम ।। सुन-सुनके मुझसे आँगन...Read more