■ मुक्तक : 983 – रवैया

होकर मैं फ़िक्रमंद तो , रोता नहीं कभी , आलम हो दिल में जब खुशी , का फूट रोऊँ मैं ।। तूफ़ान जब भी आए तो , घोड़े मैं बेचकर , चादर को लंबी तान भर , खर्राटे सोऊँ मैं...Read more

■ मुक्तक : 982 – ख़्वाहिश

सावन में झूला झूल ज्यों , उठाएँ लुत्फ़ लड़कियाँ , उससे कहीं ज़ियादा ही , उठा रहे हैं वो मज़ा ।। जानूँ न किस बिना पे पर , सुना-सुना के रात-दिन , छोटी से छोटी बात पर , कड़ी से...Read more

■ मुक्तक : 981 – नज़ारा

तेरे हुस्न का करके सिर्फ़ इक नज़ारा , फँसा था न मैं इश्क़ के जाल में जब ।। न मालूम था मुझको ग़म चीज़ क्या है ? न हरगिज़ था रिश्ता मेरा दर्द से तब ।। कि एक वक़्त था...Read more

■ मुक्तक : 980 – फ़रार

इस जहाँ की भीड़ में , निपट अकेला छोड़कर ।। यूँ गया कि ज्यों हुआ , फ़रार मुँह को मोड़कर ।। काश कह गया वो होता लौट कर न आएगा , रखते हम न उससे अब , तलक भी दिल...Read more

■ मुक्तक : 979 – मोह

उसको पाने की हुई उम्मीद जब से ख़त्म रे , रात-दिन गोते लगाता हूँ मैं गहरे यास में ।। याद रोज़ आती है उसकी इस तरह भूखे को ज्यों , चटपटा खाना या पानी याद आए प्यास में ।। उसको...Read more

■ मुक्तक : 978 – बड़ी बीमारियाँँ

दाने-दाने , पैसे-पैसे , के हैं जो मोहताज उनको , या बना दे मीर या फिर , इस तरह का कोई हल दे- राह में गिरकर पड़े इक , फूल को ज्यों कोई गाड़ी , अपने पहियों से गुजरकर ,...Read more