मुक्तक : 958 – गोवा

फ़ाख़्ताएँ मिलीं , बुलबुलें अनगिनत , था ज़रूरी बस इक राज-सारस हमें ।। ज़र ख़ुमों के ज़ख़ीरों की थी कब तलब , लाज़िमी था फ़क़त एक पारस हमें ।। इस क़दर अपनी क़िस्मत के थे दास हम । शेर थे...Read more

मुक्तक : 957 – ज़िंदा बने रहे

आँखों को लग गए थे , कुछ इस क़दर वो अच्छे , मरने तलक भी दिल में , ज़िंदा बने रहे थे ।। हम जितनी गर्मजोशी , से पेश आए उनसे , उतना वो हमसे मिलते , वक़्त अनमने रहे...Read more

मुक्तक : 956 – होश

यूँ ही हमें न पागल , सब लोग-बाग कहते ।। बिन उज्र गालियाँ जो , चुपचाप रोज़ सहते ।। इक बात और दुनिया , मै पीके लड़खड़ाती , पीते नहीं हैं जब तक , हम होश में न रहते ।।...Read more

मुक्तक : 955 – प्यास

हरगिज़ नहीं करूँगा बात सादे आब की ।। गंगो-जमन की और ना कभी चनाब की ।। जब-जब भी प्यास का करोगे मुझसे ज़िक्र तुम , तज्वीज़ मैं करूँगा पेश बस शराब की ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 954 – मैकदा

तन से बाहर दिल से अंदर आ पहुँचते ।। बेतरह तक़्लीफ़ में भी गा पहुँचते ।। तब दवा करता था ग़म की मैकदा वो , हम न जाते-जाते भी बस जा पहुँचते ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 953 – वकालत

काग़ज़ से भी ज़ियादा पतली है मेरी हालत ।। होती ही जाए दिन-दिन ये ज़िन्दगी तवालत ।। फ़िक़्रे मआश उस पर नाकाम इश्क़ के ग़म , फिर भी शराब की मैं करता नहीं वकालत ।। ( तवालत = सिरदर्द ,...Read more