■ मुक्तक : 995 – घाघरा

मुझको औरत न कहो आदमी हूँ मैं यारों , ग़म में पतलून से जो घाघरा मैं हो बैठा ।। दर्द ना क़ाबिले बर्दाश्त हो गया था तो , मर्द होकर भी सरेआम मैं भी रो बैठा ।। अपने जज़्बात सँभाले...Read more

■ मुक्तक : 994 – करूँ क्या ?

मैं क्यों बेज़ुबानों को जा-जा बकूँ कुछ ? करूँ बदकलामों से कैसे लड़ाई ? नहीं मुझमें है जब कोई बात ऐसी , कि हो हर तरफ़ मेरी चर्चा-बड़ाई ।। ये बदमाश कहती शरीफ़ों तलक को , कभी तो सुअर बोल...Read more

■ मुक्तक : 993 – घोर आश्चर्य !

वो मेरे लिए क्यों तड़पता नहीं है ? क्यों मिलने को इक पल न बेचैन होता ? चलो माना हँसता है महफ़िल में हरदम , तो तनहाई में भी कभी क्यों न रोता ? मुझे चाँद अपना जो कहते न...Read more

■ मुक्तक : 992 – बुरी आदतें

करूँ क्या मैं ? लेकिन ये सच है शुरू से , बुरी सुह्बतें मुझको लगतीं हैं अच्छी ।। न हरगिज़ जिन्हें चाहे करना ज़माना , वो सब हरक़तें मुझको लगतीं हैं अच्छी ।। सभी की पसंदों का दर्जा है आला...Read more

■ मुक्तक : 991 – उलटी बातें

सिर पे न उसके कोई , दिखता पहाड़ लेकिन , कहता है बोझ भारी मैं रोज़ ढो रहा हूँ !! आँसू कभी लुढ़कते , गालों पे उसके कब पर , हँस-हँस के बोलता है , दिन-रात रो रहा हूँ ।।...Read more

■ मुक्तक : 990 – गुनाह

कैसा गुनाह हमसे , ये आज हो गया रे ? बोतल का वो हलाहिल , हमने दवा बताया ।। नुक़सान के सिवा जो , कुछ भी नहीं था उसको , हमने बड़े यक़ीं से , ख़ालिस नफ़ा बताया !! इस...Read more