● ग़ज़ल : 294 – बिगड़ा

पुर्ज़ा-पुर्ज़ा हो ज़मीं पर आज भी बिखरा हूँ मैं ।। तब का बिगड़ा अब तलक थोड़ा नहीं सुधरा हूँ मैं ।। मुझको धक्का देके लुढ़काया गया है इस जगह , अपनी मर्ज़ी से बुलंदी से नहीं उतरा हूँ मैं ।।...Read more

● ग़ज़ल : 293 – लू-लपट

औरों को लू-लपट मुझे तो बस नसीम था ।। लगता मुझे खजूर वो भले ही नीम था ।। आदी अगर था मैं नशे का तो मेरे लिए , गाँजा-चरस था वो शराब था अफ़ीम था ।। लगता था शक्ल से...Read more

● ग़ज़ल : 292 – आख़िरी तमन्ना

वो बेदिली से मुझको , दिल से लगे हटाने ।। मैं भी न चाह कर भी , उनको जुटा भुलाने ।। मैं साँप हौले-हौले , बनता नया-नया सा , तेज़ी से हो रहे हैं , वो नेवले पुराने ।। तैयार...Read more

● ग़ज़ल : 291 – मत ठोंक-पीट मुझको

मत ठोंक-पीट मुझको , गर हो सके तो सहला ।। अब सह न पाउँगा मैं , सच वार कोई अगला ।। उनकी नज़र में था मैं , कल तक दिमाग़ वाला , हूँ आज एक अहमक़ , बेअक़्ल और पगला...Read more

ग़ज़ल : 290 – चिढ़ है जन्नत से

चिढ़ है जन्नत से न फिर भी तू जहन्नुम गढ़ ।। अपने ही हाथों से मत फाँसी पे जाकर चढ़ ।।1।। तुझको रख देंगी सिरे से ही बदल कर ये , शेर है तू मेमनों की मत किताबें पढ़ ।।2।।...Read more

ग़ज़ल : 289 – तकने लगे हैं शौक़ से

तकने लगे हैं शौक़ से आईने अब अंधे ।। गंजे अमीरुल-ऊमरा रखने लगे कंघे ।।1।। जानूँ न वो कैसी बिना पर दौड़ते-उड़ते , ना पैर हैं उनके न उनकी पीठ पर पंखे ।।2।। ये जायदादो मिल्क़ियत , माया , ख़ज़ाने...Read more