∆ ग़ज़ल : 308 – किर्दार

लाश का किर्दार यूॅं मैंने निभाया ।। मुझको सब ने मिलके ज़िंदा जा गड़ाया ।। धूप में रोटी पकाऊॅं क्योंकि सबने , जब जलाया मैंने चूल्हा आ बुझाया ।। उससे शादी हो नहीं सकती थी तब ही , उस हसीना...Read more

∆ ग़ज़ल : 307 – मैं ही जानता हूॅं

इस बात को फ़क़त मैं ही जानता हूॅं यारों ।। गिर-गिर के ही मैं इतना ऊॅंचा उठा हूॅं यारों ।। धोखा किया है उनसे मैंने ही पर मुझे वो , जानूॅं न क्यों न माने मैं बेवफ़ा हूॅं यारों ?...Read more

∆ ग़ज़ल : 306 – बाज़ियाॅं

इक के बाद इक इश्क़ की हारे गया मैं बाज़ियाॅं ।। और वाॅं करते रहे वो शादियों पे शादियाॅं ।। दिल तो मिलना दूर इज़हार ए मोहब्बत पर मुझे , उनकी जानिब से मिली है गालियों पर गालियाॅं ।। उनकी...Read more

∆ ग़ज़ल : 305 – वो पागल नहीं

है इक शख़्स जो पहले जंगल उगाता ।। उन्हें अपने हाथों से फिर ख़ुद जलाता ।। वो पागल नहीं पर रखे सर पे जूते , जहाॅं जाए सर के ही बल चलके जाता ।। दिए हैं ख़ुदा ने उसे हाथ...Read more

∆ ग़ज़ल : 304 – फूॅंककर

कोई गिर जाए तो फ़ौरन नहीं उठाता हूॅं ।। अपने क़दमों को बहुत सोच कर बढ़ाता हूॅं ।। मुझको रोने को बड़ी वज़्ह चाहिए लेकिन , क़हक़हे तो मैं बिना बात ही लगाता हूॅं ।। जब ज़बाॅं थकके मेरी चूर-चूर...Read more

∆ ग़ज़ल : 303 – हाथ मलते हैं

दिल में बस इक-दो नहीं ग़म लाख पलते हैं ।। ऑंख से ऑंसू न अलबत्ता निकलते हैं ।। लोग घूमें घर में मोटर-कार में बैठे , और हम पैदल भी मीलों-मील चलते हैं ।। हमसे फूलों का कुचलना भी नहीं...Read more