ग़ज़ल : 285 – बदनसीब हरगिज़ न हो

चोर हो , डाकू हो , क़ातिल हो , ग़रीब हरगिज़ न हो ।। आदमी कुछ हो , न हो बस , बदनसीब हरगिज़ न हो ।। ज़िंदगी उस शख़्स की , क्या ज़िंदगी है दोस्तों , गर जहाँ में...Read more

ग़ज़ल : 284 – पटक बैठीं

वे ग़फ़्लत में मेरे आगे ज़रा सा क्या मटक बैठीं ; मेरी तो बस के आँखों में , चुरा दिल , ले सटक बैठीं ।। मैं बारिश की तमन्ना में पड़ा था अब्र को तकते , खुली ज़ुल्फें वे कर...Read more

ग़ज़ल : 283 – आशिक़ी

मुझको लगता है ये ज़ह्र खा , ख़ुदकुशी कर ना जाऊँ कहीं ? अगले दिन की करूँ बात क्या , आज ही कर ना जाऊँ कहीं ? है तो दुश्मन मेरा वो मगर , ख़ूबसूरत हसीं इस क़दर ; देखकर...Read more

ग़ज़ल : 282 – शंघाई

हूँ बहुत बदशक्ल कुछ रानाई लाकर दे ।। देख सब मुँह फेरें इक शैदाई लाकर दे ।। हर तरफ़ से बस नुकीला खुरदुरा ही हूँ , आह कुछ गोलाई , कुछ चिकनाई लाकर दे ।। बख़्श मत ऊँचाई बेशक़ बित्ते...Read more

ग़ज़ल : 281 – दिला

अजब इक ग़मज़दा के पीछे चलता क़ाफ़िला है ।। नहीं रोता कोई हर शख़्स का चेह्रा खिला है ।। जो कहता था न जी पाऊँगा इक दिन बिन तुम्हारे , वो सालों-साल से ख़ुश रह रहा मेरे बिला है ।।...Read more

ग़ज़ल : 280 – लफ़ड़ा है

बेसबब मेरा नहीं दुनिया से झगड़ा है ।। मुझको सच कहने की बीमारी ने जकड़ा है ।। गर वो अब मुझसे लड़ा सीधा पटक दूँगा , देखने में वो भले ही मुझसे तगड़ा है ।। दोनों तन्हाई में छुप-छुप मिलते...Read more