ग़ज़ल : 286 – मानते हैं

इक उनका बुत बनाने मिट्टी को छानते हैं ।। अपना लहू मिलाकर फिर उसको सानते हैं ।। हैराँ न वो हमारे , रोने पे हो रहे हैं , हों मस्ख़रों को भी ग़म , शायद वो जानते हैं ।। मैं...Read more

ग़ज़ल : 285 – बदनसीब हरगिज़ न हो

चोर हो , डाकू हो , क़ातिल हो , ग़रीब हरगिज़ न हो ।। आदमी कुछ हो , न हो बस , बदनसीब हरगिज़ न हो ।। ज़िंदगी उस शख़्स की , क्या ज़िंदगी है दोस्तों , गर जहाँ में...Read more

ग़ज़ल : 284 – पटक बैठीं

वे ग़फ़्लत में मेरे आगे ज़रा सा क्या मटक बैठीं ; मेरी तो बस के आँखों में , चुरा दिल , ले सटक बैठीं ।। मैं बारिश की तमन्ना में पड़ा था अब्र को तकते , खुली ज़ुल्फें वे कर...Read more

ग़ज़ल : 283 – आशिक़ी

मुझको लगता है ये ज़ह्र खा , ख़ुदकुशी कर न जाऊँ कहीं ? अगले दिन की करूँ बात क्या , आज ही कर न जाऊँ कहीं ? है तो दुश्मन मेरा वो मगर , ख़ूबसूरत हसीं इस क़दर ; देखकर...Read more

ग़ज़ल : 282 – शंघाई

हूँ बहुत बदशक्ल कुछ रानाई लाकर दे ।। देख सब मुँह फेरें इक शैदाई लाकर दे ।। हर तरफ़ से बस नुकीला खुरदुरा ही हूँ , आह कुछ गोलाई , कुछ चिकनाई लाकर दे ।। बख़्श मत ऊँचाई बेशक़ बित्ते...Read more

ग़ज़ल : 281 – दिला

अजब इक ग़मज़दा के पीछे चलता क़ाफ़िला है ।। नहीं रोता कोई हर शख़्स का चेह्रा खिला है ।। जो कहता था न जी पाऊँगा इक दिन बिन तुम्हारे , वो सालों-साल से ख़ुश रह रहा मेरे बिला है ।।...Read more