∆ ग़ज़ल : 302 – ग़ज़लकार

मैं फिर कहता हूॅं मेरी बात पर करने यक़ीं साहिब ।। है बेशक़ शौक़ लिखने का मगर मैं हूॅं नहीं कातिब ।। न बोलें हम उसे बेगार तो क्या नाम दें कहिए ; किये जिसके कभी मिलते नहीं इन्आम या...Read more

∆ ग़ज़ल : 301- बालम

जागते-सोते या चल या थम नहीं देता ।। हाॅं ! मुझे अब कोई भी ग़म ; ग़म नहीं देता ।। वो मुझे कुछ भी कभी भी और फ़ौरन ही , जितना माॅंगूॅं उससे टुक भी कम नहीं देता ।। हैं...Read more

∆ ग़ज़ल : 300 – आब ए अंगूर

तुम फलोदी को क्या चिकमगलूर कर दोगे ? सादा पानी आब ए अंगूर कर दोगे ? मैं बता दूॅंगा उदासी का सबब लेकिन , क्या उदासी फिर मेरी तुम दूर कर दोगे ? रात दिन चाहूॅंगा तुमको जीते जी मर-मर...Read more

∆ ग़ज़ल : 299 – मुंतज़िर

ख़ुदकुशी से ख़ुद को ऐसे रोकता खड़ा रहा ।। सुब्हो-शाम , रात-दिन शराब पी पड़ा रहा ।। मुझसे मिलने कह गया था जिस जगह वो आएगा , मुंतज़िर मैं उस जगह पे उम्र भर खड़ा रहा ।। वो अड़ा रहा...Read more

∆ ग़ज़ल : 298 – रंग ए परीदा

उसके लिए जो लाखों में है बस हमीदा* इक ।। मैं काढ़ने लगा हूॅं रात दिन क़सीदा* इक ।। दुनिया में उससा दूसरा कहीं नहीं है सच , बेमिस्ल है , वो लाजवाब वो फ़रीदा* इक ।। माना कि उसने...Read more

● ग़ज़ल : 297 – ख़्वाब

न ज़मज़म का न गंगा का , न पानी दो चनाबों का ।। मुझे जो प्यास है , लाज़िम उसे दर्या शराबों का ।। हाँ ! अनपढ़ हूँ मगर हैरानगी की बात क्या इसमें , जो सौदागर हूँ मैं इस...Read more