04 : ग़ज़ल – शराब पीना है ॥

मस्त हो आज तो ख़ुम भर , शराब पीना है ।। जाके मैख़ाने नहीं घर , शराब पीना है ।।1।। हर किसी ग़म की दवा जाम ही अगर है तो , हमको बोतल ही उठाकर , शराब पीना है ।।2।। दुनिया...Read more

3. ग़ज़ल : तेरे होते निर्जन भी

तेरे होते निर्जन भी कब निर्जन होता ।। सन्नाटों में भी भौरों सा गुंजन होता ।।1।। तू न दिखे तो सच आँखें लगतीं बेमा’नी , तू जो मिले तो मन मरुथल वृन्दावन होता ।।2।। तेरे सँग ही अपना जी भर लंच...Read more

2. ग़ज़ल : पूछ काम कितना

           पूछ काम कितना और क्या न करना पड़ता है ।।   फिर भी रूखी – सूखी से पेट भरना पड़ता है ।।1।।   फ़स्ल की कहीं कोई भी नहीं कमी लेकिन ,   अब भी कुछ...Read more

1. ग़ज़ल : उचकते-कूदते बंदर

उचकते-कूदते बन्दर सधी जब चाल चलते हैं ।। मेरे जंगल के  हाथी मेंढकों जैसे  उछलते हैं ।।1।। हिमालय पे भी जब राहत पसीने से नहीं मिलती , हथेली आग लेकर हम मरुस्थल को निकलते हैं ।।2।। तुम्हारे हंस बगुले जब लगाएँ लोट काजल में , मेरे कौए...Read more