3. ग़ज़ल : तेरे होते निर्जन भी

तेरे होते निर्जन भी कब निर्जन होता ।। सन्नाटों में भी भौरों सा गुंजन होता ।। तू न दिखे तो सच आँखें लगतीं बेमा’नी , तू जो मिले तो मन मरुथल वृन्दावन होता ।। तेरे सँग ही अपना जी भर लंच...Read more

● ग़ज़ल : 02 – पूछ काम कितना

            पूछ काम कितना और क्या न करना पड़ता है ?  फिर भी रूखी – सूखी से पेट भरना पड़ता है ।।1।।  फ़स्ल की कहीं कोई भी नहीं कमी लेकिन ,  अब भी कुछ ग़रीबों को घास...Read more

● ग़ज़ल : 01 – उचकते-कूदते बंदर

उचकते-कूदते बन्दर सधी जब चाल चलते हैं ।। मेरे जंगल के  हाथी मेंढकों जैसे  उछलते हैं ।। हिमालय पे भी जब राहत पसीने से नहीं मिलती , हथेली आग लेकर हम मरुस्थल को निकलते हैं ।। तुम्हारे हंस बगुले जब लगाएँ लोट काजल में ,...Read more