मुक्तक : 964 – गाँव

क्या हो गया कि मुझको हर एक चीज़ आजकल , सच चाहिए तो चाहिए बस उसके गाँव सी ? जब से मिला हूँ उससे लगे वो ही कूकती , करते हैं और सब तो महज काँव-काँव सी ।। उसकी गली...Read more

मुक्तक : 963 – हाय !

मेरी आँखें न थीं , फिर भी मेरे लिए , दुलहनों सी वो सजती-सँवरती रही ।। जानकर भी कि मैं , एक पत्थर हूँ वो , मुझसे बेइंतिहा , प्यार करती रही ।। लोग कहते हैं घायल थी मेरे लिए...Read more

मुक्तक : 962 – वज़्न

मेरी नज़र ने ऐसा , मंज़र कभी न पाया !! बेसाख़्ता उसे तक , दिल में ख़याल आया ।। जितना है वज़्न उसका , उससे बहुत ज़ियादा , होगा मेरा तो भारी , घटता हुआ भी साया ।। -डॉ. हीरालाल...Read more

मुक्तक : 961 – मृत्यु दो

एक ही अपने ग़म का है चारा सुनो , जो बची हैं वो साँसें उखाड़ो अभी ।। ज़हर भी खा के मैं साफ़ बच जाऊँ जो , तो ज़मीं में गढ़ा खोद गाड़ो अभी ।। जिस्म बेशक़ लगे ख़ूबसूरत मेरा...Read more

मुक्तक : 960 – ख़त

क्या है वो , कैसी है वो , तारीफ़ में उसकी , हर कभी कब एकदम से ख़त उसे लिखता ? हर कहीं पर बैठ भी कब जल्दबाज़ी में , कब तकल्लुफ़ को क़सम से ख़त उसे लिखता ? दिल...Read more

मुक्तक : 959 – वापसी

महब्बत के अपने शिकंजे में कस वो , कभी करने आज़ाद हरगिज़ न आए ।। मैं लौटूँगा कहकर कई साल पहले , जो जाने के फिर बाद हरगिज़ न आए ।। उन्हें इस क़दर रफ़्ता – रफ़्ता बमुश्किल , भुलाते...Read more