मुक्तक : 1041 – पत्थर

पत्थर हूॅं पड़ा सोचूॅं कि मैं चल जाऊॅं ।। पानी हूॅं मगर चाहूॅं कि मैं जल जाऊॅं ।। दलदल से निकल जाने की मेरी कोशिश , हाथी की तमन्ना जैसे उछल जाऊॅं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 1040 – नक़ाब

डर , उनके हुक़्म से उन्हीं के रोब ओ दाब से ।। चेहरा छुपा दिखा दिया हमने नक़ाब से ।। अफ़्सोस है कि जिनकी हम नज़रों में कल तलक , थे आफ़्ताब हो गए अब माहताब से ।। -डॉ. हीरालाल...Read more

∆ ग़ज़ल : 307 – मैं ही जानता हूॅं

इस बात को फ़क़त मैं ही जानता हूॅं यारों ।। गिर-गिर के ही मैं इतना ऊॅंचा उठा हूॅं यारों ।। धोखा किया है उनसे मैंने ही पर मुझे वो , जानूॅं न क्यों न माने मैं बेवफ़ा हूॅं यारों ?...Read more

∆ ग़ज़ल : 306 – बाज़ियाॅं

इक के बाद इक इश्क़ की हारे गया मैं बाज़ियाॅं ।। और वाॅं करते रहे वो शादियों पे शादियाॅं ।। दिल तो मिलना दूर इज़हार ए मोहब्बत पर मुझे , उनकी जानिब से मिली है गालियों पर गालियाॅं ।। उनकी...Read more

∆ ग़ज़ल : 305 – वो पागल नहीं

है इक शख़्स जो पहले जंगल उगाता ।। उन्हें अपने हाथों से फिर ख़ुद जलाता ।। वो पागल नहीं पर रखे सर पे जूते , जहाॅं जाए सर के ही बल चलके जाता ।। दिए हैं ख़ुदा ने उसे हाथ...Read more

∆ ग़ज़ल : 304 – फूॅंककर

कोई गिर जाए तो फ़ौरन नहीं उठाता हूॅं ।। अपने क़दमों को बहुत सोच कर बढ़ाता हूॅं ।। मुझको रोने को बड़ी वज़्ह चाहिए लेकिन , क़हक़हे तो मैं बिना बात ही लगाता हूॅं ।। जब ज़बाॅं थकके मेरी चूर-चूर...Read more