∆ ग़ज़ल : 305 – वो पागल नहीं

है इक शख़्स जो पहले जंगल उगाता ।। उन्हें अपने हाथों से फिर ख़ुद जलाता ।। वो पागल नहीं पर रखे सर पे जूते , जहाॅं जाए सर के ही बल चलके जाता ।। दिए हैं ख़ुदा ने उसे हाथ...Read more

∆ ग़ज़ल : 304 – फूॅंककर

कोई गिर जाए तो फ़ौरन नहीं उठाता हूॅं ।। अपने क़दमों को बहुत सोच कर बढ़ाता हूॅं ।। मुझको रोने को बड़ी वज़्ह चाहिए लेकिन , क़हक़हे तो मैं बिना बात ही लगाता हूॅं ।। जब ज़बाॅं थकके मेरी चूर-चूर...Read more

मुक्तक : 1039 – तब और अब

पहले बिस्तर देखते ही नींद आ जाती थी अब , नींद की गोली के बिन सोना नहीं आता हमें ।। जागते भी कितने सपने कल तलक देखे और अब , नींद में भी ख़्वाब में खोना नहीं आता हमें ।।...Read more

मुक्तक : 1038 – पागल

हुआ इक अजब हादिसा , ताज़ा-ताज़ा , कहीं कोई मुर्दा गड़ा ही गड़ा था ।। वाॅं सब मुॅंह को बैठे थे तालों सा लटका , मैं गर्दन उठा ऊॅंट जैसा खड़ा था ।। मुझे इस क़दर तब थी हॅंसने की...Read more

मुक्तक : 1037 – तेरा ग़म

आरी से जैसे कोई लकड़ी को काटता है , पत्थर पे जैसे कोई चटनी को बाटता है , जैसे कि खाए गेहूॅं को घुन कुतर-कुतर कर , ग़म तेरा मुझको वैसे दीमक सा चाटता है ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

∆ ग़ज़ल : 303 – हाथ मलते हैं

दिल में बस इक-दो नहीं ग़म लाख पलते हैं ।। ऑंख से ऑंसू न अलबत्ता निकलते हैं ।। लोग घूमें घर में मोटर-कार में बैठे , और हम पैदल भी मीलों-मील चलते हैं ।। हमसे फूलों का कुचलना भी नहीं...Read more