∆ ग़ज़ल : 298 – रंग ए परीदा

उसके लिए जो लाखों में है बस हमीदा* इक ।। मैं काढ़ने लगा हूॅं रात दिन क़सीदा* इक ।। दुनिया में उससा दूसरा कहीं नहीं है सच , बेमिस्ल है , वो लाजवाब वो फ़रीदा* इक ।। माना कि उसने...Read more

[] नज़्म : 12 – क़िस्मत

खिलने से ही पहले मुरझाया ; मैं कैसा खिलने वाला हूॅं ? हर रोज़ क़तार में लग-लगकर , महॅंगे से मेरा महॅंगा सामाॅं , दूकान बढ़ाने से पहले , सब लोग ख़रीद-फरोख्त़ करें । कुछ रोज़ से मैं सामाॅं की...Read more

मुक्तक : 1023 – रद्दोबदल

सतपुड़ा के पहाड़ों सा कब से खड़ा , वक़्त सा अब थके बिन चला जा रहा ।। मरघटी चुप्पियों से उलट कृष्ण की , बाॅंसुरी सी मधुर धुन बना जा रहा ।। देख रद्दोबदल मुझमें ऐसा सभी , सख़्त हैराॅं...Read more

[] नज़्म : 11- सफ़ाई

हॅंस रहा हूॅं मैं जो ग़म से रोज़ खेला इसलिए ।। ख़ुश है वो उसने न अब तक दर्द झेला इसलिए ।। कितने लोगों से मोहब्बत के लिए हुमका ये दिल ? जिस्म का जुग़्राफ़िया कितनों का भाया ऑंख को...Read more

मुक्तक : 1022 – मंच

अब नसीहत के लिए लिखने में है ख़तरा बहुत , अब जरीआ ये नहीं हरगिज़ रही तम्बीह का ।। जिसको पढ़-सुन बस हॅंसी ही आए वो ही वो लिखो , रंच भर भी उसमें पुट चाहे रहे न सहीह का...Read more

मुक्तक : 1021 – अज़्म

मैं उधड़ता और फटता ही रहूॅं लेकिन ये है , ख़ुद को ख़ुद ही जिस तरह भी बन पड़े सीता चलूॅं ।। प्यास को अपनी मयस्सर ना रहे पानी अगर , अपने ऑंसू ही पसीने में मिला पीता चलूॅं ।।...Read more