1. ग़ज़ल : उचकते-कूदते बंदर

उचकते-कूदते बन्दर सधी जब चाल चलते हैं ।। मेरे जंगल के  हाथी मेंढकों जैसे  उछलते हैं ।।1।। हिमालय पे भी जब राहत पसीने से नहीं मिलती , हथेली आग लेकर हम मरुस्थल को निकलते हैं ।।2।। तुम्हारे हंस बगुले जब लगाएँ लोट काजल में , मेरे कौए...Read more

■ कहानी : प्रेरणा

    वह लड़की कभी भी मेरी मोहब्बत की तलबगार न थी क्योंकि न तो मैं खूबसूरत ही था और न ही कोई अमीरजादा।एक मामूली नौकरी करने उसके शहर में आया था। मेरे मकान मालिक की इकलौती व अत्यंत खूबसूरत लाड़ली...Read more

सन्डे हो या मंडे खाओ मुर्गा मछली अंडे

पौर्वात्य  शिष्टाचार कहता है कि हमें किसी व्यक्ति के खाने पीने की बुराई नहीं करना चाहिए ।  अतः सभ्य होने के नाते हमें चाहिए कि हम माँस भक्षियों के आगे मुर्गा मटन की अथवा सुरा प्रेमियों के सामने शराब की...Read more

इसे पढ़ना सख्त मना है !

क्योंकि आजकल सभी बचपन से ही ‘ जाकी ‘ के जांगिये पहनने लगे हैं ( और अब तो  पहलवान भी लंगोटी कि जगह सपोर्टर पहनकर डंड पेलते हैं ) अतः मस्तराम को मैं अपना लंगोटिया  यार नहीं बल्कि जांगिया दोस्त कहूँगा। वो मेरा  बेस्ट फ्रैंड है और अपने...Read more

■ शीर्षक में क्या धरा है ?

शीर्षक ! शीर्षक ! शीर्षक ! आख़िर क्या धरा है शीर्षक में ?अरे जनाब शीर्षक में ही तो सब कुछ धरा है। मुखड़ा ही सुन्दर न होगा तो अंतरा कौन सुनेगा ?चेहरा ही सुन्दर न होगा तो जुगराफिया कौन निहारेगा...Read more

मुक्तक : 801 – नश्वर

कौन यह जानता नहीं कि काया नश्वर है ? सबका जीवन यहाँ पे जल का बुलबुला भर है ॥ स्वप्न फिर भी वो जन्म-जन्म के सँजोता यों , जैसे अमृत की आया मटकियाँ गुटक कर है ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more