इसे पढ़ना सख्त मना है !

क्योंकि आजकल सभी बचपन से ही ‘ जाकी ‘ के जांगिये पहनने लगे हैं ( और अब तो  पहलवान भी लंगोटी कि जगह सपोर्टर पहनकर डंड पेलते हैं ) अतः मस्तराम को मैं अपना लंगोटिया  यार नहीं बल्कि जांगिया दोस्त कहूँगा। वो मेरा  बेस्ट फ्रैंड है और अपने...Read more

■ शीर्षक में क्या धरा है ?

शीर्षक ! शीर्षक ! शीर्षक ! आख़िर क्या धरा है शीर्षक में ?अरे जनाब शीर्षक में ही तो सब कुछ धरा है। मुखड़ा ही सुन्दर न होगा तो अंतरा कौन सुनेगा ?चेहरा ही सुन्दर न होगा तो जुगराफिया कौन निहारेगा...Read more

■ मुक्तक : 801 – नश्वर

कौन यह जानता नहीं कि काया नश्वर है ? सबका जीवन यहाँ पे जल का बुलबुला भर है ।। स्वप्न फिर भी वो जन्म-जन्म के सँजोता यों , जैसे अमृत की आया मटकियाँ गुटक कर है !! -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more