■ मुक्तक : 12 – आँख में सैलाब

आँख में सैलाब सा उसकी भरा है ।। यों तो गुर्राता है लेकिन कुछ डरा है ।। सिर्फ़ लगता है हमें अल्मस्त ओ ज़िंदा , दरहक़ीक़त ग़मज़दा है , वो मरा है ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

* कविता : दृष्टव्य बंधन

जो तुम चले जाते हो तो ये बहुत बुरा लगता है कि मुझे बिलकुल भी बुरा नहीं लगता । मैं चाहता हूँ मुझे सबसे अच्छा लगे जब तुम मेरे पास रहो ; क्योंकि हम बँधे हैं उस बंधन में ,...Read more

■ मुक्तक : 11 – आज़माइश

फ़र्ज़ , क़ायदा-ओ-क़ानून निभाने में उस्ताद हूँ मैं ।। सख़्त उसूलों की ज़ंजीरों से जकड़ा आज़ाद हूँ मैं ।। ख़ूब आज़माइश झुलसाकर , ठोंका-पीटी कर करलो , मोम नहीं हूँ आला दर्ज़े का लोहा-फ़ौलाद हूँ मैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

■ मुक्तक : 10 – किस क़दर गुनाह

उससे मासूम ने ये किस क़दर गुनाह किया ।। हर कोई शख़्स कह रहा है क्यों ये आह ! किया ? जाने हालात कैसे पेश उसके साथ हुए ? अस्पताल एक चारागर ने क़त्लगाह किया ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

20. ग़ज़ल : नाख़ुश मैं अपने

नाख़ुश मैं अपने आप से रहता हूँ आजकल अरे ।। अच्छा हूँ ख़ुद को पर बुरा कहता हूँ आजकल अरे ।।1।।  कल तक मैं सख़्त बर्फ़ की था इक सफ़ेद झील सा , नीली नदी की धार सा बहता हूँ आजकल अरे ।।2।।  तूफ़ाँँ के वास्ते हिमालय की तरह था मैं कभी , पर रेत  के घरौंदों सा ढहता हूँ आजकल अरे ।।3।।  अपनी ख़ुशामदों से मैं चिढ़ता...Read more

■ मुक्तक : 9 – चूहे सब शेर

चूहे सब शेर -ए- बब्बर की बात करते हैं ।। जितने हारे वो सिकंदर की बात करते हैं ।। रब ने दे क्या दी ज़ुबाँ कान पास तो लाओ , अंधे रंगीनी -ए- मंज़र की बात करते हैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more