■ मुक्तक : 8 – सर्दियों में ज्यों सुलगती

सर्दियों में ज्यों सुलगती लकड़ियाँ अच्छी लगें ॥ जैसे हँसती खिलखिलाती लड़कियाँ अच्छी लगें ॥ मुझको मौसम कोई हो जलता-जमाता-भीगता , बंद कमरे की खुली सब खिड़कियाँ अच्छी लगें ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

■ मुक्तक : 7 – औरतों सा सख़्त ग़म में

औरतों सा सख़्त ग़म में भी सुबुकने ना दिया ।। सर किसी क़ीमत पे मैंने अपना झुकने ना दिया ।। मुझको लँगड़ा कहने वालों के किये यूँँ बंद मुँँह , मैंने मंज़िल पर भी आकर ख़ुद को रुकने ना दिया ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

● 19. ग़ज़ल : मुझमें ख़ूब बचा है

  मुझमें ख़ूब बचा है अब भी , मुझको यार चुका मत समझो ।। राख तले हूँ लाल धधकता , इक अंगार बुझा मत समझो ।। यूँ अंदाज़-ए-जिस्म को तक तक , क्या-क्या तुम अंदाज़ लगाते , थपको मुँँह पर छींटे...Read more

18. ग़ज़ल : कुछ नहीं सूझता

कुछ नहीं सूझता कि क्या लिक्खूँ ? पहला ख़त है डरा-डरा लिक्खूँ ॥ उसने पूछा है हाल-ए-दिल मेरा , कोई बतलाए क्या हुआ लिक्खूँ ? हुस्न के जितने रंग होते हैं ? उसमें बाक़ी है कौन सा लिक्खूँ ? नाम उसका ही बस ज़ुबाँ रटती , क्या...Read more

■ मुक्तक : 6 – कि जैसे आपको नीर

कि जैसे आपको नीर अपने घर का क्षीर लगता है ।। ज़रा सा पिन किसी सुल्तान की शम्शीर लगता है ।। तो फिर मैं क्या ग़लत कहता हूँ मुझको शह्र गर अपना , भयंकर गर्मियों में वादी-ए-कश्मीर लगता है ? –डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

■ मुक्तक : 5 – अब यास से

अब यास से है अपने , लबरेज़ दिल का आलम ।। उम्मीद की बिना पर , अब तक रहे थे कायम ।। जब हर तरफ़ मनाही , है चप्पा-चप्पा नफ़्रत , बतलाओ किस बिना पे , ज़िंदा रहें भला हम ?...Read more