6. ग़ज़ल : मुझको वो बच्ची…………..

मुझको वो बच्ची लगती है ।। सचमुच ही अच्छी लगती है ।। ख़ूब पकी है और मधुर बस , दिखने में कच्ची लगती ।। यों अंदाज़े बयाँ है उसका , झूठी भी सच्ची लगती है ।। शेरों जैसी होकर भी...Read more

¿? व्यंग्य : तोल मोल के बोल

बड़े -बड़े लोगों में न जाने कैसी कैसी छोटी-छोटी , गंदी-गंदी आदतें होती हैं और ग़ुस्सा तो तब आता है जब वे दूसरों को उस काम से रोकते हैं मसलन खुद तो कहाँ-कहाँ ऊँगली और खुजली करेंगे और हमसे कहेंगे...Read more

5. ग़ज़ल : इक हथकड़ी

इक हथकड़ी सा काँँच का कंगन लगा मुझे ।। आज़ादियों का तोहफ़ा बंधन लगा मुझे ।।1।। इस तरह साफ़ हो रहे हैं पेड़ शह्र से , दो गमले क्या दिखे कहीं गुलशन लगा मुझे ।।2।। तनहाई दूर होगी ये आया था सोचकर , मेले में और भी अकेलापन...Read more

04 : ग़ज़ल – शराब पीना है ॥

मस्त हो आज तो ख़ुम भर , शराब पीना है ।। जाके मैख़ाने नहीं घर , शराब पीना है ।। हर किसी ग़म की दवा जाम ही अगर है तो , हमको बोतल ही उठाकर , शराब पीना है ।। दुनिया...Read more

3. ग़ज़ल : तेरे होते निर्जन भी

तेरे होते निर्जन भी कब निर्जन होता ।। सन्नाटों में भी भौरों सा गुंजन होता ।। तू न दिखे तो सच आँखें लगतीं बेमा’नी , तू जो मिले तो मन मरुथल वृन्दावन होता ।। तेरे सँग ही अपना जी भर लंच...Read more

● ग़ज़ल : 02 – पूछ काम कितना

            पूछ काम कितना और क्या न करना पड़ता है ?  फिर भी रूखी – सूखी से पेट भरना पड़ता है ।।1।।  फ़स्ल की कहीं कोई भी नहीं कमी लेकिन ,  अब भी कुछ ग़रीबों को घास...Read more