■ मुक्तक : 1000 – ख़्वाब

सर पे गारा-ईंट-पत्थर-ख़ाक ढोते ।। सिर्फ़ जो दो जून की रोटी को रोते ।। देख कर पर्वाज़ भरते पंछियों को , क्यों वे उड़़ना चाहें जिनके पर न होते ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

■ मुक्तक : 999 – फ़र्क़

पास आने दो महक अपने तन की लेने दो , दूरियों से तो दमकता गुलाब लगते हो ।। जब तलक पी न लें कैसे पता चले क्या हो ? देखने में तो पुरानी शराब लगते हो ।। लोग कहते हैं...Read more

■ मुक्तक : 998 – भँवरा

तुझको बनते फूल जब-जब देखता , हाय भँवरा ही हुआ जाता हूँ सच ।। तुझको छूते ही गुलाबों-मोगरों – का मैं गजरा ही हुआ जाता हूँ सच ।। रू-ब-रू होता है मेरे जब भी तू ; कम से कम उस...Read more

[] नज़्म []

जाने किस हाल में है , है वो ख़ुश कि है ग़मगीं ? जाओ ढूँढो उसे , छुपा नहीं वो खोया है ; सच न देखूँगा और कुछ भी मैं ज़माने में , अब तो आँखों से उसका ही नज़ारा...Read more

■ मुक्तक : 996 – रोज़गार की महत्ता

आँखें तो क्या हैं बल्ब सा ये सिर भी फूट जाए ।। क्या फ़िक्र हाथ – पाँव कोई काट – कूट जाए ।। लाज़िम मगर है मेरी नाक की सलामती को , छूटे न रोज़गार चाहे साँस छूट जाए ।।...Read more