मुक्तक : 1039 – तब और अब

पहले बिस्तर देखते ही नींद आ जाती थी अब , नींद की गोली के बिन सोना नहीं आता हमें ।। जागते भी कितने सपने कल तलक देखे और अब , नींद में भी ख़्वाब में खोना नहीं आता हमें ।।...Read more

मुक्तक : 1038 – पागल

हुआ इक अजब हादिसा , ताज़ा-ताज़ा , कहीं कोई मुर्दा गड़ा ही गड़ा था ।। वाॅं सब मुॅंह को बैठे थे तालों सा लटका , मैं गर्दन उठा ऊॅंट जैसा खड़ा था ।। मुझे इस क़दर तब थी हॅंसने की...Read more

मुक्तक : 1037 – तेरा ग़म

आरी से जैसे कोई लकड़ी को काटता है , पत्थर पे जैसे कोई चटनी को बाटता है , जैसे कि खाए गेहूॅं को घुन कुतर-कुतर कर , ग़म तेरा मुझको वैसे दीमक सा चाटता है ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

∆ ग़ज़ल : 303 – हाथ मलते हैं

दिल में बस इक-दो नहीं ग़म लाख पलते हैं ।। ऑंख से ऑंसू न अलबत्ता निकलते हैं ।। लोग घूमें घर में मोटर-कार में बैठे , और हम पैदल भी मीलों-मील चलते हैं ।। हमसे फूलों का कुचलना भी नहीं...Read more

मुक्तक : 1036 – बशर्ते

बाग़ से फूलों के जैसे मैं ज़मीं से , आस्माॅं से दिन में तारे तोड़ देता ।। मोमबत्ती जैसे फ़ौलादी सलाखें , चुटकियों में हॅंसते-हॅंसते मोड़ देता ।। हाॅं ! बशर्ते मुझसे वो कहते लजाकर , ज़िद पे अड़के ,...Read more

मुक्तक : 1035 – चटाक

ख़ुद को टकराए ख़ुद ही पहले पत्थरों से फिर , काॅंच जैसा चटाक से वो टूट रोता है ।। क़ैद से भागने के ख़्वाब देखता है फिर , अपने पिंजरे से हैराॅं हूॅं वो छूट रोता है ।। देखने में...Read more