मुक्तक : 1020 – यारियाॅं

कुत्ते से अजनबी को तक चुप रहा न जाए ।। मालिक की भी सुने ना जब भौंकने पे आए ।। चोरों से पहरेदारों की यारियों को समझो , ऑंखों से यूॅं ही कोई अंजन चुरा न पाए ।। -डॉ. हीरालाल...Read more

मुक्तक : 1019 – फ़ैसला

यूॅं ही खड़ा हुआ था मैं किसी को देखता , वो भी निगाह मुझपे ही जमाए था खड़ा ।। मेरी नज़र जमी थी उसके ढलवाॅं हुस्न पर , वो तक रहा था क़द मेरा बुलंद औ’ बड़ा ।। मैं उसको...Read more

मुक्तक : 1018 – लिखता रहूॅं

काग़ज़ों पर ही सही हाॅं मगर महब्बत से , झोपड़ी को भी हमेशा महल की सूरत दूॅं ? बिखरी किरचों को सड़क के बबूली काॅंटों को , चुनके पलकों से गुलाबी कमल की सूरत दूॅं ? कौन समझेगा कि ख़ुद...Read more

मुक्तक : 1017 – काइनात

मेरी मुश्किल की बिलआख़िर नजात वो ही हैं ।। हाॅं वो ही मेरा जनाज़ा ; बरात वो ही हैं ।। दोस्त मेरे हैं बहुत कम , मगर हैं जितने भी , मुझको लगता है मेरी काइनात वो ही हैं ।।...Read more

‌मुक्तक : 1016 – इरादा‌

इस ज़मीं पर नहीं और न उस , आस्माँ पर बनाऊँगा मैं ।। सुन मुनादी मेरी आज ये , और यक़ीं कर बनाऊँगा मैं ।। अपनी नज़रों में भी ना जगह देने वाले इरादा मेरा , एक दिन तेरे पत्थर...Read more

■ मुक्तक : 1015 – आईना

चढ़ता जोबन भी लुढ़कता सा जुरा लगने लगे ; ख़ुद को जब ख़ुद का हसीं-चेह्रा बुरा लगने लगे ; मत ज़रा होना मुशव्वश तब यही यह सोचकर ; फूल-आईना भला अब क्यों छुरा लगने लगे ? ( जोबन =जवानी /...Read more