● ग़ज़ल : 291 – मत ठोंक-पीट मुझको

मत ठोंक-पीट मुझको , गर हो सके तो सहला ।। अब सह न पाउँगा मैं , सच वार कोई अगला ।। उनकी नज़र में था मैं , कल तक दिमाग़ वाला , हूँ आज एक अहमक़ , बेअक़्ल और पगला...Read more

■ मुक्तक : 978 – बड़ी बीमारियाँँ

दाने-दाने , पैसे-पैसे , के हैं जो मोहताज उनको , या बना दे मीर या फिर , इस तरह का कोई हल दे- राह में गिरकर पड़े इक , फूल को ज्यों कोई गाड़ी , अपने पहियों से गुजरकर ,...Read more

■ मुक्तक : 977 – ख़्वाब

हैं नहीं मुम्किन कुछ ऐसी , मंज़िलों के ख़्वाब पाले ।। हाँ सहारो – थार में मैं , बादलों के ख़्वाब पाले ।। इक जुनूनी की तरह क्यों ,पाँव नंगे चल पड़ा हूँ , हाथ में इक बीज लेकर ,...Read more

■ मुक्तक : 976 – पढ़

तू पर्वत सा खड़ा अचल , सरिता सा बढ़-बढ़ जाएगा ।। एक उठा पग तुंग शिखर , टीले जैसा चढ़ जाएगा ।। मैं कविताओं का इक मोटा , ग्रंथ हज़ारों पन्नों का , एक पृष्ठ बस देख मेरा , फिर...Read more

■ मुक्तक : 975 – शीर ( दूध )

देखा है मैंने अक्सर , ऐसी जगह जहाँ पर , सूई न मिल सके वाँ , से तीर माँगते वो ।। भूखे फ़क़ीर से जा , कह-कह के उसको मालिक , खाने को इक कटोरा , भर खीर माँगते वो...Read more

मुक्तक : 974 – सीख लूँगा

हमदर्द जब नहीं वो , अपना रहा तो अब से , हर दर्द उफ़ किए बिन , सहना मैं सीख लूँगा ।। गज़ भर ज़बान रखकर , भी धीरे-धीरे गूँगा – बन जाउँगा रे चुप-चुप , रहना मैं सीख लूँगा...Read more