मुक्तक : 1043 – पलटा

जाने क्या हासिल हुआ या खो गया या छिन गया , तर्ज़ो अंदाज़ आजकल सब खा गया पलटा मेरा ? पाॅंवों से करता हूॅं अपने सब के सब ही काम मैं , कारवाॅं दिन-रात अनथक हाथों से चलता मेरा ।।...Read more

मुक्तक : 1042 – क्यों ?

गंगा की धार में कुछेक मोड़-माड़कर , मुट्ठी में दाबे तैरकर बहाने को चला ।। जलती चिता में बच गए वो फाड़-फूड़कर , थैले में रख दबा-छुपा जलाने को चला ।। जाॅं से कहीं ज़ियादा जो सॅंभाल कर रखे ;...Read more

मुक्तक : 1041 – पत्थर

पत्थर हूॅं पड़ा सोचूॅं कि मैं चल जाऊॅं ।। पानी हूॅं मगर चाहूॅं कि मैं जल जाऊॅं ।। दलदल से निकल जाने की मेरी कोशिश , हाथी की तमन्ना जैसे उछल जाऊॅं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 1040 – नक़ाब

डर , उनके हुक़्म से उन्हीं के रोब ओ दाब से ।। चेहरा छुपा दिखा दिया हमने नक़ाब से ।। अफ़्सोस है कि जिनकी हम नज़रों में कल तलक , थे आफ़्ताब हो गए अब माहताब से ।। -डॉ. हीरालाल...Read more

∆ ग़ज़ल : 307 – मैं ही जानता हूॅं

इस बात को फ़क़त मैं ही जानता हूॅं यारों ।। गिर-गिर के ही मैं इतना ऊॅंचा उठा हूॅं यारों ।। धोखा किया है उनसे मैंने ही पर मुझे वो , जानूॅं न क्यों न माने मैं बेवफ़ा हूॅं यारों ?...Read more

∆ ग़ज़ल : 306 – बाज़ियाॅं

इक के बाद इक इश्क़ की हारे गया मैं बाज़ियाॅं ।। और वाॅं करते रहे वो शादियों पे शादियाॅं ।। दिल तो मिलना दूर इज़हार ए मोहब्बत पर मुझे , उनकी जानिब से मिली है गालियों पर गालियाॅं ।। उनकी...Read more